जब शादी की नौबत आयी,सबने खुशी मनाई।ना मालूम था ये तो वारन्त गिरफ़्तारी है।खाता है जो मिलता है,कोल्हु के बेल सा पिलता है।करता है वही जो फ़र्मान् सरकारी है।।ना तौबा का अधिकार,ना कोइ सुने गुहार।लग गयी जैसे कोइ ता-उम्र की बीमारी है।दिन-रैन ना चैन कोइ,मुख में ना बेन कोइ।बन्धुआ मजदूर की नाइ,करता बेगारी है।।अब नही कोइ निज़ात्,जब् दाल में मिल गया भात।कातर वचनो से ही बोलो,शरणागति तुम्हारी है।।
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