Shri Krishna Govind Harey Murarey Hey Nath Narayan Vasudeva…

“महामन्त्रार्थ”

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ।
(यह महामन्त्र है । अन्तर्निहित अर्थ (भावार्थ)के ज्ञानसहित इसका जप करें । भावार्थ नीचे दिया जा रहा है – )

श्रीकृष्ण – हे प्रभो ! आप सभीके मनको आकर्षित करनेवाले हैं, अतः आप मेरा मन भी अपनी
ओर आकर्षित कर अपनी भक्ति-सेवाकी दिशामें सुदृढ़ कीजिये ।

गोविन्द – गौओंतथा इन्द्रियोंकी रक्षा करनेवाले भगवन् ! आप मेरी इन्द्रियोंको स्वयंमें लीन करें ।

हरे – हे दोखहर्ता ! मेरे दुःखोंका भी हरण करें ।

मुरारे – हे मुर राक्षसके शत्रु ! मुझमें बसे हुए काम-क्रोधादिरूपी राक्षसोंका नाश कीजिये ।

हे नाथ – आप नाथ हैं और मैं अनाथ हूँ । (मुझ अनाथका भाव आप नाथके साथ जुड़ा रहे ।)

नरायण – मैं नर हूँ और आप नारायण हैं । (आपको प्राप्त करनेके लिये आपके आदर्शपर मैं
तपस्यामें रत रहूँ ।)

वासुदेव – वसुका अर्थ है प्राण । मेरे प्राणोंकी रक्षा करें । मैंने अपना मन आपके चरणोंमें अर्पित
कर दिया है ।

(गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित “कल्याण – संकीर्तानांक”से)

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